Monday, October 26, 2015

बेटियाँ

बेटियाँ

खुशियों का एक जहान होती हैं बेटियाँ
शुभ लाभ का निशान होती है बेटियाँ
संस्कार और रीति रिवाजों को समेटे
पिता की एक पहचान होती है बेटियाँ
गमों को छिपा के खुशियों को बाँटती
इन लबों की मुस्कान होती है बेटियाँ
बेटा छोडता माता पिता को वृद्धाश्रम
उनके गम में कुर्बान होती है बेटियाँ
बेटे चले जा रहे है गर्त में हर रोज
हौसलों की एक उडान होती है बेटियाँ
कभी रानी, लाडो और लक्ष्मी अयान
सदा ही भाग्यवान होती है बेटियाँ

मै लेखक हूं इस आजाद गगन का.

मै लेखक हूं इस आजाद गगन का.
कभी रह न पाया वैचारिक बंधन में.

नियम कायदे बेमानी से लगते है.
अवसर मिलने पर क्यों जगते हैं.
मेरी कलम न अनुशासन में रह पायी.
गलत बात को वह ना सच कह पायी.
समझ के परे लगी मुझको वो बातें.
ऐसे लोगों से बेहतर मै रहूं निर्जन में.

मेरी खुद की सोच से मेरा लेखन है.
गुरूओं का दिया ग्यान ही दर्पण है.
समाज ने जैसा रंग दिखाया है मुझको.
परिस्थियों ने खूब जगाया है मुझको.
लेखन से नेपथ्य का सच बताने को.
मै ठान चुका हूं उद्देश्य यही अंतर्मन में. .

लेखन कोई चारण नही है सत्ता का.
यह कोई उच्चारण नहीं है भत्ता का.
लेखन ही क्या जो मानदेय से बिक जाये.
दोदूना दस अपने लालच मे लिख जाये.
मेरे लिखने से कोई हंगामा हो ना हो
कुछ चिंतन पैदा हो जाये जन जन में...

फलसफों का ख्वाबों के संग कारवां होता है

जब हक़ीकत का जिंदगी में सामना होता है.
फलसफों का ख्वाबों के संग कारवां होता है.

सिफर से उंचाइयों तक जो भी पहुंचता है़.
उसे अपने बलबूते पर बहुत गुमां होता है.

जिसकी हिफ़ाजत करती हैं मंज़िलें खुद.
उसके जीने की खातिर पूरा जहां होता है.

सब्र तो जरा कर रास्ते के ऐ मुसाफिर.
ज़द के लिये हर ज़र्रे पर मकां होता है.

मंज़िलें उन्हें ही नसीब होती हैं यहां अयान.
जो इसकी अना पर हमेशा फ़ना होता है.

अता होता है मुकम्मल जहां उसी को
जो इसकी खातिर ही यहां बना होता है.

जन्मों का संबंध हुआ है.

जन्मों का संबंध हुआ है.
जन्मों का संबंध हुआ है.
ऐसा कुछ अनुबंध हुआ है.

दिल की बातें ये दिल जाने.
जो जाने वो ही वह माने.
रिस्तों की सांसे थामे अब.
सच्चे को सब ही पहचाने.
तुम सपनों की शहजादी
मन बाग की सुगंध हुआ है.

दिल की एक कहानी होती.
मौजों के जैसे रवानी होती.
मन माने तो हरजाई सब.
या दिल की मनमानी होती.
शब्द मेरे कुछ ऐसे ढलते.
जैसे गीतों का बंध हुआ है.

आना जाना सब पहचाना
हाँ हाँ से हो जाती ना ना
नये पुराने के चक्कर में
जीते जी पडता मर जाना
पर स्नेह के संबल से अब
सांसों का तटबंध हुआ है.

अनिल अयान,सतना

दिल की बातें ये दिल जाने.
जो जाने वो ही वह माने.
रिस्तों की सांसे थामे अब.
सच्चे को सब ही पहचाने.
तुम सपनों की शहजादी
मन बाग की सुगंध हुआ है.

दिल की एक कहानी होती.
मौजों के जैसे रवानी होती.
मन माने तो हरजाई सब.
या दिल की मनमानी होती.
शब्द मेरे कुछ ऐसे ढलते.
जैसे गीतों का बंध हुआ है.

आना जाना सब पहचाना
हाँ हाँ से हो जाती ना ना
नये पुराने के चक्कर में
जीते जी पडता मर जाना
पर स्नेह के संबल से अब
सांसों का तटबंध हुआ है.

अनिल अयान,सतना

Sunday, March 2, 2014

GEET

जिस दिन तुम्हे ये मंजिलें मिल जायेगीं
उस दिन तुम्हे मै भी कहीं याद आऊँगा.
यादों के संग कुछ काफिले बन जायेंगें.
फिर से खुशी के गीत मै भी गाऊँगा.

जब भी खतरों में लगे ये जिंदगी.
और उज्जवल कल ना दे बंदगी.
मंजिलों से जब भी तुम हटने लगो.
और भोरमभोर जब तुम ना जगो.
जब भी अंधेरों से डर लगने लगे
और डर तुमको रंग रगने लगे
उस हार के पहले तुम याद करना
तुम्हारे संग मै मंजिलों तक जाऊँगा.
जिस दिन तुम्हे ये मंजिलें मिल जायेगीं
उस दिन तुम्हे मै भी कहीं याद आऊँगा.१.


हौसले जब भी तुम्हारा साथ छोडे
और साथी सब तुम्हारा हाथ छॊडे
यदि मंजिलों की राह में पडना अकेले
अनवरत तब तुमको है बढना अकेले.
मंजिलें पाने की खातिर बढना पडेगा.
संघर्ष करके यह समर लडना पडेगा.
तुम्हारे चेहरे मे दिखे जब मुझको खुशी.
तुम्हारे संग मै विजय ध्वज लहराऊँगा.
जिस दिन तुम्हे ये मंजिलें मिल जायेगीं
उस दिन तुम्हे मै भी कहीं याद आऊँगा.२.
 अनिल अयान.

Sunday, February 16, 2014

गीत-२. -निर्वासित-

गीत-२. -निर्वासित-
उमर भर का स्वप्न था जो
आज निर्वासित हो गया था
जीवन का संत्रास बनकर के
अपनी पलकें भिगो गया था.

सपनों का माकान खडाकर
जीवन यापन करते थे
और राजनैतिक हथकंडो से
नेता शासन करते थे
शासन और प्रशासन सबका
अपना अपना काम था
वहाँ बना बाजार बडा था
सबका अपना दाम था.
बस्ती वालों का कुछ पल में
जीवन ही सारा खो गया था.

संगीनों और सिपेहसलारों से
बस्ती की जनता काँप गई.
नियम कानूनों के चलते वो
आगामी खतरों को भाँप गई.
उमर भर की कमाई से यारो
सबने अपना घर बनवाया
और प्रशासन की सह पर
आशियाना एक तनवाया.
ठिठुरता बचपन और बुढापा
खुले आसमाँ में सो गया था.

उजडे परिवार सडक पर थे
खुला आसमाँ ही छत था.
मानवीय आपदा से पीडित
किसी मासूम का खत था.
आवासित से निर्वासित होकर
उमर भर का दंश मिला था
ना ही कोई मदद मिली थी
ना मानवीयता का अंश मिला
महिला पुरुष और बूढे बच्चे
हर दिल इससे रो गया था.
अनिल अयान श्रीवास्तव,सतना.

सुकूँ है कहाँ मुझको बता दीजिये.

सुकूँ है कहाँ मुझको बता दीजिये.

हर तरफ नफरतों का घनघोर तम
सूर्य बनकर इसको हटा दीजिये
रोशनी दीजिये और ऊष्णता दीजिये
द्वेष की खाइयों को पटा दीजिये

दर्द है जिंदगी में यहाँ आजकल
सब करने लगे देख करके नकल
जब फुरसत मिली सब बुराई किये
दिलों में जलाते स्वार्थ के सब दिये
अवसर के तवों में राग सिकने लगा
बाजार में हुनर भी आज बिकने लगा
उलझनों में यहाँ वक्त कट रहा है
सुकूँ है कहाँ मुझको बता दीजिये.

उमर बढती रही सोच घटती रही
स्नेह की धार अश्रु बन कर बही
दाव चलते रहे शतरंज की जमीं
मूर्त सत्य है यहाँ खुशी और गमी
लोकतंत्र की कहानी लिखी जा रही
विवादों के संग समाज में आ रही
होनहार पूँछ बैठे यदि कभी आप से
मँजिलों का उसको पता दीजिये.
अनिल अयान श्रीवास्तव,सतना
९६४०६७८१०४०