Wednesday, March 15, 2017

कमजोरों को सुनता कौन।

कमजोरों को सुनता कौन।
मीठे सपनों को बुनता कौन।
बलिहारी है पीर पराई।
जमते आंसू गहरी खाई।
अपने मे सभी है लीन।
खारा पानी प्यासी मीन।
दर्द छिपाये बैठे हैं सब
खुशी के मोती चुनता कौन।
साढे साती लगे हुए हैं।
कितने घाव दगे हुए हैं।
रोज कमाना रोज खाना।
वर्ना भरना है हर्जाना।
जीवन की इस लीला में
अक्षरशः अब गुनता कौन।
सूरज के उगने से लेकर।
चंदा को एक सत्ता देकर।
रोटी कपडा और घरौंदा।
सोता वह मुख को औंधा।
किस्मत को रोज कोसता।
अपने सीने को धुनता कौन।

सबका अपना जीवन है

सबका अपना जीवन है
अपना अपना करते सब।
परोपकार है महज दिखावा
नेकी करना है एक छलावा
जो नेकी की बनता मूरत
होता जीवन भर पछतावा
स्वार्थ साधने की खातिर
हर पग मे है छलते सब।
अपने राम है अपनी लीला
कोई होता नाडे से ढीला।
महज दिखावे की खातिर
कोई करता पलकें गीला।
जग को राख बनाने खातिर
अंतर्मन में हैं जलते सब।
रिश्तों की है एक परछाई
मायावी है लगती रुसवाई
खुशियों के दीपक सूखे
तेल निकाले यह मंहगाई
जहरीले सर्प बनते वो है
जो आस्तीन मे पलते सब
अनिल अयान सतना

जब कभी

जब कभी
घर में 
पार्टीज
या
फंग्शन
का
आयोजन 
होता है। 
गिफ्ट्स का
बस 
संकलन
होता है। 
इसी 
बहाने 
गिफ्ट्स 
के जरिए 
सिवाय
माता पिता 
के
चाचा मामा
चाची मामी
बुआ मौसी
दादा नाना
दादी नानी
का
मूल्यांकन 
होता
है। 
ना
जाने
क्यों 
इन
विचारों का
मन मे 
अंकन
होता
है।

जिंदगी एक कैनवास है।

जिंदगी एक 
कैनवास है। 
सफेद आकाश में
ख्वाबों के
रंगों को
कोई
हर रोज
इस पर भरता है। 
।।। 
पर
अंततः देखो
हर रंग
रंगत 
छोड़ देता है।।।। 
महसूस होता
हर पल
हर
छण। 
मन को भी। 
होता
आभास है। 
जिंदगी 
सच
मे 
मेरे लिये
एक 
कैनवास है।।।।।

बेबस सी ये सांस है और बेबस है मान।

बेबस सी ये सांस है और बेबस है मान। 
सुविधाभोगी वो बने जो करते गुणगान। 

बदहाली का राग है  राजनीति मे टंच। 
वाद युद्ध दिखने लगा चाहे कोई मंच। 

वोट नीति है राजनीति  मचा रही अंधेर। 
पिछलग्गू बनता सदा जो करता है देर। 

वनवासी सपने हुए वक्त वक्त का फेर। 
अनजाने अपने हुए वे मचा रहे अंधेर। 

बदलावों के हादसे करते रहे प्रपंच। 
कौन यहां मौन है और कौन है टंच। 

चुप्पी अधरों की देख नजरे है हैरान। 
मौन दुहाई दे रहा लुटता जो सम्मान। 

परिभाषा बदल गई दिखा नया विवेक। 
अंतर्मन मे पल रहा देखो यह अतिरेक। 

देशद्रोह का पाप लै जनता हुई अधीर। 
आंखे हैं बौरा रही जिसमे छिपता नीर।

नये साल की नयी सुबह

नये साल की नयी सुबह
करती है ये आह्वान। 
हर पल बचा रहे सदा। 
यकीन और सम्मान। 

मंजिल और बुलंदी का
ना चढे किसी को दंभ। 
एक वर्ष छूट गया है। 
दूजे का होता आरंभ। 

कहने को हर वर्ष ही
होता मिलन विछोह। 
सबसे ममता मोह है। 
सबकी ममता मोह। 

वक्त आयेगा जायेगा
इसका यही दस्तूर। 
तटस्थ रहेगा जो सदा
बढेगा उसका नूर। 

नये साल की ये सुबह
देती एक संदेश। 
स्वच्छ बनाये रखो तुम। 
अंतर्मन परिवेश। 
अनिल अयान। सतना।

मै निरुत्तर रहा।

मै निरुत्तर रहा। 
मै कुछ ना कहा। 

चाहे हो खुशी या
या गहरा सा गम
चाहे हो तपन या।
चाहे घनघोर तम
लहरों के विपरीत 
मै हरदम ही बहा। 

जो ये थी रुसवाई 
बसती गई गहराई 
दिल की पीर अब
दिखती रही पराई।
गमों संग कस्ती पे
तूफां के तेवर सहा।

भीड थी रिश्तों में। 
जो मिले किस्तों में। 
वो यादें पिरोते हुई। 
कैद हुई बस्तों मे। 
थामने को सब थे। 
मै अकेला ढ़हा। 

जिंदगी ढलती रही। 
धडकन जलती रही। 
उम्र हुई बौनी छौनी। 
मौत मन पलती रही। 
कोई पल "आह" का। 
और कोई कहे "अहा"। 
अनिल अयान